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स्वतंत्रता सैनानी तात्या टोपे Tatya Tope का जीवन परिचय

Tatya tope
तात्या टोपे 18 सो 57 की क्रांति के एक महत्वपूर्ण व्यक्तित्व में से एक थे जिन्होंने वर्तमान मध्यप्रदेश के और उत्तर प्रदेश की सीमा में स्थित झांसी राज्य के क्षेत्र से रानी लक्ष्मीबाई के साथ मिलकर अंग्रेजो के खिलाफ 1857 की क्रांति में भाग लिया था इस क्रांति में उन्होंने रानी लक्ष्मीबाई की सेना की सैन्य शक्ति को बढ़ाने का काम किया था इसीलिए मध्य प्रदेश के स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों में जब भी तात्या टोपे का नाम लिया जाता है तो उन्हें रानी लक्ष्मीबाई से जोड़कर देखा जाता है इसीलिए हमें तात्या टोपे के बारे में और स्वतंत्रता संग्राम में उनके भाग लेने की जानकारियां अवश्य रूप से होना चाहिए आइए जानते हैं तात्या टोपे की

 एक संक्षिप्त जीवन परिचय

तात्या टोपे का नाम वास्तविक रूप में रामचंद्र पांडुरंग था और उनका जन्म अहमदनगर जिले के येवला नामक गांव में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था उनके परिवार में उनके छोटे भाई गंगाधर के द्वारा रामचंद्र पांडुरंग को तात्या कह कर पुकारा जाता था इसीलिए उनका नाम तात्या पड़ गया था पारिवारिक रूप से उनका नाम तात्या मेवलेकर था किंतु जब उन्होंने महाराणा शासक बाजीराव के अधीन कार्य करना आरंभ किया और उनकी कार्यकुशलता से प्रसन्न होकर बाजीराव ने तात्या मावलेकर को एक रत्न जड़ित टोपी उपहार में प्रदान की और तात्या टोपे ने जब यह टोपी पहनी तो उन्हें बाजीराव ने तात्या टोपे कह कर पुकारा साथ ही अन्य सभी लोग भी उन्हें टोपे नाम से पुकारने लगे और इस प्रकार रामचंद्र पांडुरंग का नाम तात्या टोपे पड़ गया तात्या टोपे की पिता का नाम पांडुरंग था जबकि मावालेकर उनका उपनाम था उनकी माता का नाम रुकमा बाई था तथा वे मराठा साम्राज्य में पेशवा बाजीराव के अधीन कार्य करते थे 

तात्या टोपे ने रानी लक्ष्मीबाई जिन के बचपन का नाम मनु था उनका पालन पोषण किया और उन्हें शस्त्र सिखाने में काफी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई साथी झांसी में अंग्रेजो के खिलाफ रानी लक्ष्मी बाई के संघर्ष में तात्या टोपे ने एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई उन्होंने अंग्रेजों के विरुद्ध एक सफल सैन्य संगठन का संचालन किया और रानी लक्ष्मीबाई की सहायता की तात्या ने गनिमी कावा पद्धति अपनाते हुए कई अनेक युद्ध जीतने में बड़ी सफलता हासिल की थी और अंग्रेजो के खिलाफ जोरदार संघर्ष किया था किंतु अंग्रेजों के बढ़ते प्रभाव के कारण रानी लक्ष्मीबाई और उनकी सेना अंग्रेजों के समक्ष कमजोर पड़ गई और तात्या टोपे भी इस समय अंग्रेजों के सामने कमजोर पड़ गए वह अंग्रेजों से बचने के लिए नेपाल चले गए किंतु तात्या टोपे की मुखबिरी नरवर के राजा मानसिंह ने की और तात्या टोपे के नेपाल होने की सूचना अंग्रेजों को प्रदान की जिसके पश्चात अंग्रेजों ने तात्या टोपे को नेपाल से गिरफ्तार कर लिया और 1859 में शिवपुरी के सैन्य अदालत में न्यायिक मुकदमा चलाया जिसमें उन्हें फांसी की सजा सुना दी गई इस समय से न्यायालय के अध्यक्ष कैप्टन बांग थे जिन्होंने तात्या टोपे को मृत्युदंड देने का निर्णय लिया और न्यायालय के आदेशानुसार 18 अप्रैल 1859 को तात्या टोपे को शिवपुरी में फांसी दे दी गई जिस स्थान पर तात्या टोपे को फांसी दी गई उसी के समीप उनकी एक समाधि का निर्माण किया गया जो कि वर्तमान समय में भी स्थित है तात्या टोपे की फांसी ,1859 की क्रांति की एक महत्वपूर्ण घटना थी और 1857 की क्रांति की अंतिम घटना थी और इस घटना के पश्चात 1857 की क्रांति को समाप्त मान लिया गया

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